पीड़ा की कुक्षि से ही दर्द के गीत निकलते हैं, तभी कोई ग़ज़ल असर करती है,  कवि श्याम बिहार प्रभाकर के काव्य-संग्रह ‘शहर सो रहा है’ का हुआ लोकार्पण, हुई कवि गोष्ठी…..

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पीड़ा की कुक्षि से ही दर्द के गीत निकलते हैं, तभी कोई ग़ज़ल असर करती है,  कवि श्याम बिहार प्रभाकर के काव्य-संग्रह ‘शहर सो रहा है’ का हुआ लोकार्पण, हुई कवि गोष्ठी…..

 

पटना डेस्क :- व्यथा और संवेदना, कवि-मन का स्थाई भाव है। यह न हो तो मर्म-स्पर्शी कविता किस कोख से जन्म लेगी? पीड़ा की कुक्षि से ही दर्द के गीत निकलते हैं और उसी गर्भ से पैदा हुई ग़ज़ल भी असर करती है। उम्र के ८८ वें वर्ष में भी तरल-सरल और युवा-मन रखने वाले कवि श्याम बिहारी प्रभाकर भी एक ऐसे हीं कवि हैं, जिनका हृदय समाज की पीड़ा से द्रवित होता है और उनका दर्द उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता है। तभी तो कवि लिखता है – “दर्द ही मेरे गीत बन गए, जीवन के संगीत बन गए”।
यह विचार बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में कवि प्रभाकर के काव्य-संग्रह “शहर सो रहा है’ के लोकार्पण-समारोह और कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि कवि प्रभाकर के व्यक्तित्व और रचनाधर्मिता के भी अनेक आयाम हैं।किंतु उनकी विशिष्टता सादा जीवन और उच्च विचार है। समाज की पीड़ा पर बुद्धिजीवियों का मौन उन्हें दुखी करता है तो उन्हें लिखना पड़ता है – “शहर सो रहा है/ शहर जाग रहा है/ लगता है सड़कों पर भाग रहा है/ बुद्धिजीवी सो रहा है।”
समारोह का उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक की सभी रचनाओं में कवि का अपना दर्द अभिव्यक्त हुआ है।
पुस्तक का लोकार्पण करते हुए, ‘बिहार-गीत’ के रचनाकार और हिन्दी प्रगति समिति के अध्यक्ष कवि सत्यनारायण ने कहा कि बहुत पहले दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ बहुत चर्चित हुई थी कि – “कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक घर के लिए/ यहाँ चिराग़ मयससर नहीं शहर के लिए”। कुछ इसी तरह के हालात आज भी हैं और कवि प्रभाकर ने अपनी कविताओं में इसकी अभिव्यक्ति की है। प्रभाकर जी की तर्जे-बयानी भी मन मोहती है।
वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि प्रभाकर के काव्य में श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य भी है। ये हँसाते नहीं, गुदगुदाते हैं। इनके व्यंग्य चुटीले हैं। इनकी रचनाओं की विशेषता यह है कि इन्होंने आँखिन देखी को अपनी रचना का विषय बनाया है।
लोकार्पित पुस्तक के कवि श्री प्रभाकर ने अतिथियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के पश्चात अपनी पुस्तक से पाँच प्रतिनिधि कविताओं का पाठ किया।
सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, अखिल भारतीय वरिष्ठ नागरिक संघ के अध्यक्ष चंद्रिका यादव, बी डी कौलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डा जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता, डा मेहता नगेंद्र सिंह तथा बाँके बिहारी साव ने भी कवि को अपनी शुभकामनाएँ दी।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन में, वरिष्ठ कवि कमला प्रसाद, बच्चा ठाकुर, डा ब्रह्मानंद पाण्डेय, लता प्रासर, डा दिनेश दिवाकर,जय प्रकाश पुजारी, श्रीकांत व्यास, आनंद किशोर मिश्र, अर्जुन प्रसाद सिंह, मनोरमा तिवारी, शबहचंद्र सिन्हा, सिद्धेश्वर, चंद्रिका ठाकुर ‘देशदीप’, राजेश दूबे आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं को स्वर दिए। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने, धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने तथा मंच का संचालन कुमार अनुपम ने किया।
कवि की तीनों पुत्रियाँ मीना गुप्ता, मंजू गुप्ता और नियति गुप्ता, प्रवीर पंकज, नरेंद्र कुमार झा,कुमार गौरव, अजय गुप्ता, चंद्रशेखर आज़ाद, अमरनाथ प्रभाकर, डा सुभाष चंद्र, हीरालाल साहू, रामाशीष ठाकुर, मनोरंजन सहाय, संदीप स्नेह,सौरभ कुमार पाण्डेय, दुःख दमन सिंह, अशोक कुमार, सोनेलाल राय समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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