डा दीन के काव्य में ही नहीं प्राण में भी कबीर थे, डा उषा रानी जी वैदुष्य और वात्सल्य की संज्ञा ही थी, साहित्य सम्मेलन में दोनों साहित्यिक-युगल को श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण, डा मंगला रानी की पुस्तक ‘अक्षर मोती का नज़राना’ का हुआ लोकार्पण…..

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डा दीन के काव्य में ही नहीं प्राण में भी कबीर थे, डा उषा रानी जी वैदुष्य और वात्सल्य की संज्ञा ही थी, साहित्य सम्मेलन में दोनों साहित्यिक-युगल को श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण, डा मंगला रानी की पुस्तक ‘अक्षर मोती का नज़राना’ का हुआ लोकार्पण…..

 

पटना डेस्क :- स्तुत्य कवि और शिक्षाविद प्रो सीताराम ‘दीन’ हिन्दी के एक ऐसे महान कवि हुए, जिनके काव्य में ही नही, प्राण में भी कबीर बसते थे। उन्होंने अपने साहित्य और जीवन में भी कबीर को प्रत्यक्ष उतारा और जिया भी। वे एक स्वाभिमानी साहित्यकार, निष्ठावान प्राध्यापक और आध्यात्मिक चिंतन से युक्त एक अति संवेदनशील कवी थे। वहीं उनकी धर्मपत्नी प्रो उषा रानी सिंह ‘दीन’, उनके पद-चिन्हों पर चलने वाली एक ऐसी प्राणवंत कवयित्री थीं, जिन्हें वैदुष्य और वात्सल्य की संज्ञा कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा।
यह बातें, बुधवार को, डा सीताराम दीन-डा उषारानी सिंह स्मृति न्यास के तत्त्वावधान में, दोनों युगल साहित्य-मनीषियों की स्मृति में, बिहात हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित स्मृति-पर्व की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि वे दोनों हिन्दी साहित्य में एक ऐसे दम्पत्ति हुए, जिन्हें आदर्श-युगल के रूप में स्मरण किया जाता रहेगा। समान-गुण-धर्म वाले युगल संसार में बहुत थोड़े होते हैं।
समारोह के मुख्य अतिथि और कौलेज औफ़ कौमर्स के प्राचार्य डा तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि वे भी उसी महाविद्यालय के शिक्षक अब प्राचार्य हैं, जिसमें दीन जी और उषा जी भी शिक्षक रहे। दीन जी के साक्षात्कार का सौभाग्य उन्हें नहीं हुआ किंतु उषा रानी जी के साथ उनका आत्मीय लगाव रहा। वी बड़ी विदुषी और स्नेह-पूरित शिक्षिका थीं। उन्होंने महाविद्यालय में एक अलग ही छाप छोड़ी थी, जिनका सभी आदर करते थे। यह प्रसन्नाता की बात है कि उनकी पुत्री डा मंगला रानी, अपने माता-पिता के पद-चिन्हों पर चलते हुए, उनकी हीं भाँति उसी महाविद्यालय में उसी विभाग में सेवाएँ दे रही हैं, जिसमें इनके माता-पिता ने दी।
इस अवसर पर डा मंगला रानी की काव्य-पुस्तक ‘अक्षर मोती का नज़राना का लोकार्पण विदुषी प्राध्यापिका और सम्मेलन की साहित्यमंत्री डा भूपेन्द्र कलसी ने किया। अपने लोकार्पण उद्गार में डा कलसी ने कहा कि मंगला जी के काव्य में, उनके माता-पिता के समान ही आध्यात्मिक-दर्शन का गहरा प्रभाव है। शब्दों के चयन और उनके प्रयोग की इनकी क्षमता इनकी काव्य-प्रतिभा को श्रेष्ठतम बनाती है। इनकी रचनाओं में जीवन के सभी रंग-रूप, संवेदनाएँ, समाज की पीड़ा, समस्याएँ और उसके प्रतिकार के स्वर भी मुखरित हैं। इनकी कविताएँ जीवन के प्रात राग और उत्साह का सृजन करती है, जो साहित्य का अभीष्ट है।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, डा मधु वर्मा, डा उषा सिंह, डा मनोज कुमार, कुमार अनुपम, श्रवण कुमार सिंह शेखावत, पूनम आनंद,आराधना प्रसाद, डा अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, प्रेम किरण, डा सुमित प्रसाद, डा अजय कुमार तथा नेहा निहारिका ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए ।
इस अवसर पर छात्र-छात्राओं के लिए काव्य-पाठ प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें एहसान रज़ा, आनंद कुमार, आयुषी वर्णवाल, भारती मिश्र, अनीशा कुमारी, सेजल रानी, अभिषेक आनंद, नीतू कुमारी, ऋषिकान्त , रित्विक रंजन, कुणाल कुमार, प्रियंका यादव आदि सम्मिलित हुए। प्रतियोगिता में नीतू कुमारी को प्रथम, तथा आनंद कुमार को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। मंच का संचालन डा मंगला रानी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कवयित्री डा अर्चना त्रिपाठी ने किया।
सम्मेलन के प्रबंध मंत्री कृष्णरंजन सिंह, डा सुधा सिन्हा, अम्बरीष कांत, प्रो सुशील कुमार झा, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, जय प्रकाश पुजारी,मधु रानी लाल, माधुरी भट्ट, मौसमी सिन्हा, राज किशोर झा आदि अनेक प्रबुद्धजन एवं छात्रगण उपस्थित थे।

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