भारतेंदु ने अंगुली पकड़ कर ‘हिन्दी’ को चलना सिखाया, राजा जी ने ऋंगार किया, साहित्य सम्मेलन में भारतेंदु और राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह की जयंती मनाई गई, हुई लघुकथा-गोष्ठी…..

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07/09/2021
भारतेंदु ने अंगुली पकड़ कर ‘हिन्दी’ को चलना सिखाया, राजा जी ने ऋंगार किया / साहित्य सम्मेलन में भारतेंदु और राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह की जयंती मनाई गई, हुई लघुकथा-गोष्ठी/
10/09/2021

भारतेंदु ने अंगुली पकड़ कर ‘हिन्दी’ को चलना सिखाया, राजा जी ने ऋंगार किया, साहित्य सम्मेलन में भारतेंदु और राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह की जयंती मनाई गई, हुई लघुकथा-गोष्ठी…..

 

पटना डेस्क :- आधुनिक हिन्दी के रूप गठन में, महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चन्द्र का योगदान अभूतपूर्व है। विद्वान इतिहासकार मानते हैं कि ये भारतेंदु ही थे जिन्होंने ‘हिन्दी’ को अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया। किंतु हिन्दी के जिन कवियों और कथाकारों ने उसके बालों में कंघी की, उसे शब्द-पुष्पों और भावों से श्रींगार किया, उनमें महान कथा-शिल्पी राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का नाम अग्र-पांक्तेय है। राजाजी, कथा-लेखन में अपनी अत्यंत लुभावनी शैली के कारण, हिन्दी कथा साहित्य में ‘शैली-सम्राट’ के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उनकी कहानियाँ अपनी नज़ाकत भरी भाषा और रोचक चित्रण के कारण, पाठकों को मोहित करती हैं।
यह बातें आज यहाँ बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में भारतेंदु और राजाजी के संयुक्त जयंती-समारोह एवं लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, कहानी किस प्रकार पाठकों को आरंभ से अंत तक पढ़ने के लिए विवश कर सकती है, इस शिल्प को राजा जी जानते थे। इसीलिए वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय कहानीकार सिद्ध हुए। उन्होंने अपनी कहानियों में समय का सत्य, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को सर्वोच्च स्थान दिया। वे ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ और सांप्रदायिक सौहार्द के पक्षधर थे। अपनी भाषा में भी उन्होंने इसका ठोस परिचय दिया। उनकी अत्यंत लोकप्रिय रही रचनाओं ‘राम-रहीम’ ‘माया मिली न राम’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘गांधी टोपी’, ‘नारी क्या एक पहेली’, ‘वे और हम’, ‘तब और अब’, ‘बिखरे मोती’ आदि में इसकी ख़ूबसूरत छटा देखी जा सकती है।
समारोह का उद्घाटन करते हुए, विद्वान विधिवेत्ता और पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मांधाता सिंह ने कहा कि, यह दुखद है कि भारतीय समाज अभी भी अंग्रेज़ी में ही अपना भविष्य देखता है, जिससे रोज़ी-रोटी मिलेगी। आज के विद्यार्थी हिन्दी से भागते हैं, क्योंकि वे इसमें अपना भविष्य नहीं देखते। इस भ्रांति को दूर किया जाना चाहिए। साहित्य सम्मेलन को उन विद्वानों को भी अपने से जोड़ना चाहिए जो अन्य विषयों के ज्ञाता और उसमें साहित्य का सृजन करना चाहते हैं।
आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन की साहित्यमंत्री डा भूपेन्द्र कलसी ने कहा कि भारतेंदु को आधुनिक हिन्दी का पितामह कहा जाता है। भारतेंदु ने हमें अपनी मातृ-भाषा से प्रेम करना और उस पर गौरव करना सिखाया। वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे। सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, पूर्व भाप्रसे अधिकारी और कवि बच्चा ठाकुर, ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, जय प्रकाश पुजारी, पं गणेश झा, बिंदेश्वर प्रसाद गुप्ता, श्रीकांत व्यास तथा डा बी एन विश्वकर्मा ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कथा-गोष्ठी में सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने ‘एक सिक्का दो पहलू’ शीर्षक से, विभा श्रीवास्तव ने ‘ग़ैरतदार’, कुमार अनुपम ने ‘पशु कौन’, डा आर प्रवेश ने ‘वनवास’, चितरंजन भारती ने ‘पीछा करती दृष्टि’, डा पंकज प्रियम ने ‘गले की हड्डी’, डा विनय कुमार विष्णुपुरी ने ‘ऐहसास’, सुनील कुमार दूबे ने ‘न्यायाधीश’, राज किशोर झा ने ‘जहां काम आए सूई’ तथा रवि श्रीवास्तव ने ‘कर्त्तव्य बोध’ शीर्षक से अपनी लघुकथा का पाठ किया।मंच का संचालन सुनील कुमार दूबे ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
वरिष्ठ कवि शुभचंद्र सिन्हा, डा मुकेश कुमार ओझा, अर्जुन प्रसाद सिंह, अमन वर्मा, अमीरनाथ शर्मा, नरेंद्र झा, श्री बाबू तथा सुरेंद्र चौधरी समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

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