आह्लादकारी है चिकित्सा विज्ञान की मानस-भूमि से काव्य-साहित्य की उत्पत्ति, डा धीरेंद्र कुमार सिंह के मैथिली काव्य-संग्रह ‘कदमों के निशान’ के हिन्दी अनुवाद का लोकार्पण, विद्वान अनुवादक पं भवनाथ झा का हुआ अभिनन्दन…..

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आह्लादकारी है चिकित्सा विज्ञान की मानस-भूमि से काव्य-साहित्य की उत्पत्ति, डा धीरेंद्र कुमार सिंह के मैथिली काव्य-संग्रह ‘कदमों के निशान’ के हिन्दी अनुवाद का लोकार्पण, विद्वान अनुवादक पं भवनाथ झा का हुआ अभिनन्दन…..

 

पटना डेस्क:-  कोई चिकित्सक, अभियन्ता, पुलिस अधिकारी या वैज्ञानिक यदि काव्य-साहित्य में रूचि रखता है, तो यह साहित्य संसार के लिए प्रसन्नता का विषय है। डा धीरेंद्र कुमार सिंह, कैंसर रोग के विशेषज्ञ सुप्रतिष्ठ चिकित्सा-विज्ञानी हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि डा सिंह चिकित्सा विज्ञान के अतिरिक्त रचनात्मक साहित्य भी लिख रहे हैं। चिकित्सा-विज्ञान की मानस-भूमि से काव्य-साहित्य की उत्पत्ति हो, यह निश्चय हीं साहित्य-संसार के लिए आह्लादकारी है।
यह बातें शनिवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में पं भावनाथ झा द्वारा अनूदित डा धीरेंद्र के मैथिली काव्य-संग्रह के हिन्दी अनुवाद ‘कदमों के निशान’ का लोकार्पण करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि पुस्तक के सुबुद्ध लेखक ने कैंसर के प्रति समाज को जागरूक करने हेतु एक बहुत ही मूल्यवान पुस्तक की रचना की थी। हिन्दी साहित्य उनसे यह अपेक्षा रखता है कि वे चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए हिन्दी में पाठ्य-पुस्तकें भी लिखें।डा सुलभ ने अनुवाद कर्ता पं भावनाथ झा को अंग-वस्त्रम देकर सम्मानित किया।
समारोह के मुख्य अतिथि और वरिष्ठ साहित्यकार जियालाल आर्य ने कहा कि, अनुवाद वह विधा है, जिससे भाषा और साहित्य की गुणात्मक प्रगति होती है। साहित्य आगे बढ़ता है। मैथिली की काव्य-कृति को हिन्दी में अनुवाद कर पं भवनाथ झा ने प्रशंसनीय कार्य किया है।
पुस्तक के मूल रचनाकार डा धीरेंद्र सिंह ने कहा कि, हिन्दी भारत की सशक्त संपर्क भाषा है। विदेशों में जहां भी भारतीय हैं, हिन्दी के लेखकों और कवियों को ही नहीं, हिन्दी बोलने वाले का भी खुले मन से स्वागत करते हैं। मैं अपने वैज्ञानिक-पत्रों को, विदेशों में भी हिन्दी में पढ़ता हूँ, जिसे सुनकर भारत के लोग बहुत ही प्रसन्न होते हैं और बहुत मान-सम्मान देते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य देना सीखता है। लेने का नहीं देने का नाम है कविता।
काव्य-संग्रह के हिन्दी अनुवाद कारने वाले विद्वान कवि पं भवनाथ झा ने कहा कि डा धीरेंद्र की कविताएँ आधुनिक दृष्टि-बोध का परिचय देती हैं। जब मैंने मैथिली में रचित इनकी कविताओं को देखा तो मुझे लगा कि कवि ने मिथिला की विशद और प्राचीन संस्कृति की अनुभूतियों को जिस प्रकार अपनी काव्यानुभूति बनाई है, उसका हिन्दी में अनुवाद होना चाहिए। प्रो बी एन विश्वकर्मा तथा गुंजन श्री ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने अपनी ग़ज़ल की इन पंक्तियों से किया कि , “तनहाइयों की उमर भी कितनी हंसी लगी/ हर रंज में ख़ुशी के बहाने लिखे मिले”। वरिष्ठ शायर रमेश कँवल ने कहा कि “जिन्हें भूलने में जमाने लगे हैं/ वो रह-रह के अब याद आने लगे हैं/ गिरफ़्तार ग़ज़लों की ख़ुशबू में है जो/ वो हिन्दी लिपि आज़माने लगे है।”
वरिष्ठ कवि और सम्मेलन के उपाध्यक्ष मृत्यंजय मिश्र ‘करुणेश’ का कहना था कि, “वो लथपथ तन-बदन सारा लहू से तरबतर देखा/ चलाया जिसने था पत्थर असर देखा न सर देखा/ जो हमला कर चले भागे, न कोई ग़ैर था उनमें/ वो सब के सब तो थे अपने, इधर देखा, उधर देखा ”।
व्यंग्य के कवि ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, कुमार अनुपम, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, मोईन गिरीडीहवी, राज किशोर झा आदि ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन कवि सुनील कुमार दूबे ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

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